अहम मुद्दों पर राहुल व कांग्रेस का नकारात्मक रवैया

नीरज मनजीत
भारत और अमेरिका के बीच बहुत ही अच्छी ट्रेड डील पर रज़ामंदी के बाद दो महान लोकतांत्रिक देशों के आपसी रिश्ते मिठास की ओर वापस लौट आए हैं। इस डील पर पिछले साल से बातचीत चल रही थी। इस दौरान राष्ट्रपति ट्रंप के अप्रत्याशित अवांछित बयानों की वजह से कुछ कड़वाहट भी पैदा हुई। रूस से तेल ख़रीदी के बहाने ट्रंप ने भारत पर मनमाना टैरिफ थोप दिया था। मगर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के गरिमापूर्ण धैर्य, वैश्विक समुदाय के विपरीत ध्रुवों को साधकर रास्ता निकालने की कला और बदलते शक्ति संतुलन पर गहरे सकारात्मक दृष्टिकोण ने हालात बिगड़ने नहीं दिए।
हमने देखा है कि पिछले वर्ष पीएम मोदी पर किस क़दर दबाव था। ऑपरेशन सिंदूर के बाद डोनाल्ड ट्रंप असत्य असहज कथनों के जरिए उन्हें अनवरत दुविधा में डालने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे थे। इधर हमारा विपक्ष ट्रंप के हर बयान पर तोतारटंत लगाकर उन्हें कठघरे में खड़ा कर रहा था। ट्रंप के टैरिफ और 25 फ़ीसदी जुर्माने को लेकर तथा ऑपरेशन सिंदूर के दौरान सीज़फायर के फैसले पर कई तरह के असत्य नैरेटिव खड़े करके मोदी सरकार की विदेश नीति को विफल बताया जा रहा था। रूस से तेल की खरीदारी से चिढ़े ट्रंप भारत की इकोनॉमी को “मृत अर्थव्यवस्था” बता रहे थे और विपक्ष तोते की तरह इसे हर जगह दोहरा रहा था।
इस बेतरह दबाव के बावजूद मोदी सरकार अपनी विदेश नीति पर दृढ़ता से चलती रही और परिणाम आज सबके सामने है। ऐसे दबाव के बीच इंग्लैंड, न्यूज़ीलैंड और ओमान से फ्री ट्रेड एग्रीमेंट किए गए। और जब यूरोपीय यूनियन से “मदर ऑफ आल डील” को अंजाम तक पहुंचाया गया, तो विपक्ष की सारी असत्य कथाएं ध्वस्त हो गईं।भारत ने अमेरिका से बहुत ही सावधानी बरतते हुए डील की है। डील में किसानों, डेयरी उत्पादकों, मछुआरों के हितों से कोई समझौता नहीं किया गया है। मगर हमारा विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस और उसका इकोसिस्टम, डील की ग़लत और असत्य व्याख्या करके किसानों को भ्रमित करने, भड़काने का प्रयास कर रहा है।
2 फरवरी को जैसे ही डील का ऐलान हुआ, कांग्रेस और उसके इकोसिस्टम की असत्य की फैक्टरी चल पड़ी। राहुल गांधी, अखिलेश यादव सहित किसानों के कुछ स्वयंभू आन्दोलनजीवी तथाकथित हितैषी, मोदी के अंधविरोधी पत्रकारों की टोली मिलकर अनवरत असत्य नैरेटिव खड़े कर रहे हैं कि इस डील से हमारे किसानों को नुक़सान होगा। जबकि यह बात नितांत ग़लत है। इस डील से हमारे किसानों, लघु उद्यमियों, निर्यातकों को निश्चित फ़ायदा होगा। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल और कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने भी सीधे और साफ़ शब्दों में कहा है कि “सोयाबीन, मक्का, चावल, गेहूं, चीनी, अनाज, पोल्ट्री, डेयरी, केले, स्ट्रॉबेरी, चेरी, सिटरस फ़्रूट्स, हरी मटर, काबुली चना, मूंग, तिलहन, इथेनॉल, तंबाकू जैसे उत्पादों पर टैरिफ में कोई छूट नहीं दी गई है। इसके अलावा मुख्य फसलों, फलों और डेयरी उत्पादों के मामले में अमेरिका के लिए कोई दरवाज़ा नहीं खोला गया है।”
इस डील को लेकर कांग्रेस का रवैया नितांत नकारात्मक दिखाई पड़ रहा है। समझना मुश्क़िल है कि क्यों कांग्रेस और राहुल गांधी पिछले कुछ वर्षों से अनवरत नेगेटिव मोड में चल रहे हैं? क्या उन्हें लगता है कि वे इन्हीं तौर-तरीक़ों से मोदी और भाजपा को पीछे धकेल सकते हैं, जबकि हर बार उन्हें और कांग्रेस को इस नेगेटिविटी का अच्छा खासा ख़ामियाज़ा भुगतना पड़ा है? क्या इतनी सी बात राहुल और उनके सलाहकारों को समझ में नहीं आ रही है कि जब भी वे मोदी की पॉज़िटिव इमेज तोड़ने की कोशिश करते हैं, ख़ुद उनकी और कांग्रेस की विश्वसनीयता कम होती है। बिहार के चुनाव से पहले उन्होंने वोट चोरी की बेहद आक्रामक और बेहद नकारात्मक कहानियां फैलाईं। इस मुद्दे को वे जनता की अदालत में ले गए। बिहार के नतीजों ने साफ़ कर दिया कि जनता ने इस सफ़ेद झूठ को नकार दिया है। लगता है पिछली विफलताओं से कांग्रेस और राहुल ने कोई सबक नहीं सीखा है।
बुधवार को लोकसभा में जब राहुल को बोलने का मौका मिला, तो एक बार फिर चीज़ों और मुद्दों को नेगेटिव तरीक़े से पेश करने का उनका वही पुराना रवैया नज़र आया। उनके भाषण की सुई अभी तक “नरेन्दर सरेंडर” और “मोदी घबराए हुए हैं” और अडानी-अंबानी के धिसे-पिटे रेकॉर्ड पर टिकी हुई है। इस बार उन्होंने पीएम मोदी पर “देश बेच दिया” का बेहद संगीन आरोप लगाया। उनका कहना था कि ट्रंप ने मोदी को गर्दन से पकड़ रखा है और मनचाही डील तैयार करवाई है। इन आरोपों का जनता पर कोई असर होगा, ऐसा नहीं लगता। कांग्रेस की दिक़्क़त यह है कि जनता के बीच राहुल की विश्वसनीयता रसातल में पहुँच चुकी है।
राहुल ने एप्सटीन फ़ाइल में पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी का नाम होने का इल्ज़ाम लगाया, तो पुरी ने लोकसभा में तो जवाब दिया ही, उसके बाद संसद के बाहर एक प्रेस कॉन्फ्रेंस लेकर विस्तार से इस मामले के हर पहलू की जानकारी दी। पुरी ने बड़ी ही स्पष्टता से कहा कि “उन्होंने 2009 में जेफरी एपस्टीन से मुलाकात की थी और उस वक़्त वे न्यूयॉर्क में भारत के राजदूत थे। यह मुलाकात अंतरराष्ट्रीय पीस इंस्टिट्यूट के एक प्रतिनिधिमंडल के सदस्य के रूप में हुई थी। ये सारे तथ्य पब्लिक डोमेन में हैं। पुरी ने जिस मुखर अंदाज़ से अपने ऊपर लगे इल्ज़ामों को नकारते हुए राहुल गांधी की खिंचाई की है, वह एक तरह से राहुल के लिए चुनौती है कि वे पुरी और एप्सटीन के बीच औपचारिक मुलाकात में कुछ ग़लत है, तो सबूत पेश करें।
दरअसल राहुल गांधी पिछले कई महीनों से “दागो और भागो” यानी “बग़ैर किसी सबूत के इल्ज़ाम लगाओ और खिसक लो” की नीति पर चल रहे हैं। लोकसभा में उन्होंने मोदी सरकार पर संगीन आरोप लगाए और जवाब सुने बिना संसद से बाहर निकल गए। वे और कांग्रेस अपने वक्तव्यों पर चाहे जितना ख़ुश हो लें, मगर जनता हक़ीक़त से अच्छी तरह वाक़िफ़ है और वक़्त आने पर उन्हें जनता का जवाब मिल जाएगा।
पूर्व आर्मी जनरल एमएम नरवणे की किताब “फोर स्टार्स ऑफ डेस्टिनी” में छपे कुछ अंशों को लेकर राहुल और कांग्रेस की ज़िद के चलते जिस तरह से तीन दिनों तक संसद की कार्रवाई ठप्प की गई, उसका भी जनता के बीच अच्छा संदेश नहीं गया है। इरादा एक बार फिर मोदी की इमेज पर ख़राश डालना था, मोदी को भीरू साबित करना था। एक बार फिर वही नकारात्मक सोच थी। राहुल इस किताब के उन कुछ अंशों को पढ़ना चाहते थे, जो एक पत्रिका में छपे थे। जबकि लोकसभा के नियम 353 के तहत “यदि कोई सदस्य किसी व्यक्ति या मामले पर कोई दस्तावेज़ या किताब का हवाला देना चाहता है, तो उसे पहले स्पीकर को सूचित करना पड़ता है और प्रमाणित करना पड़ता है कि वह जानकारी सही है। यदि सामग्री अवांछित या अप्रमाणित है, तो स्पीकर उसे पढ़ने से रोक सकते हैं।”
इस नियम के तहत स्पीकर ओम बिरला ने राहुल को रोका, तो कांग्रेस ने हंगामा खड़ा कर दिया। पार्टी की महिला सांसद पीएम की कुर्सी घेर कर खड़ी हो गईं। किसी अप्रिय स्थिति को टालने की वजह से मोदी ने संसद में आना मुनासिब नहीं समझा, तो फिर वही घिसा-पिटा कथन कि “मोदी डर गए हैं”। इस मामले में ट्विस्ट तब आता है, जब राहुल संसद के बाहर मीडिया के सामने किताब की हार्ड कॉपी लहराने लगते हैं। उसके फ़ौरन बाद इस किताब के प्रकाशक पेंगुइन पब्लिकेशन का बयान आता है कि “यह किताब अभी सॉफ्ट या हार्ड कॉपी में प्रकाशित नहीं की गई है और यदि सार्वजनिक तौर पर यह किताब किसी प्लेटफॉर्म पर है, तो यह ग़ैरकानूनी और कॉपीराइट नियमों का उल्लंघन है।” जनरल नरवणे भी एक ट्वीट के जरिए पेंगुइन के बयान को सही ठहरा देते हैं।
इस पूरे मामले में दिल्ली पुलिस के स्पेशल सेल ने एफआईआर दर्ज करके जाँच शुरू कर दी है। स्पष्ट है कि ग़लत तरीके से मोदी को घेरने के चक्कर में राहुल ने अपने और कांग्रेस के लिए एक और परेशानी का सबब पैदा कर लिया है। इसके अलावा संसद में उनके ख़िलाफ़ सब्सटेंटिव मोशन लाने की बात चल रही है। मगर इन सारी बातों का उन पर कोई असर होगा, ऐसा नहीं लगता। शायद वे चाहते हैं कि मोदी सरकार उन पर कड़ा एक्शन ले और वे विक्टिम कार्ड खेलने लगें। हम मानते हैं कि राहुल एक प्रबुद्ध राजनेता हैं, मगर अक़्सर उनका गैर जिम्मेदाराना रवैया और मुद्दों का ग़लत चयन उन्हें पीछे कर देता है।