वनमाली कथा सम्मान में साहित्य, संवाद और रंगमंच का जीवंत समागम

राष्ट्रीय कथा सम्मान से सम्मानित रचनाकारों ने किया रचना पाठ

भोपाल। तीन दिवसीय वनमाली कथा सम्मान समारोह के दूसरे दिन प्रथम सत्र में सम्मानित रचनाकारों का ‘रचना पाठ’ आयोजित किया गया। ज्ञानपीठ से सम्मानित वरिष्ठ रचनाकार प्रतिभा राय की अध्यक्षता और राजेन्द्र प्रसाद मिश्र तथा संतोष चौबे के सान्निध्य में आयोजित इस सत्र में मृदुता गर्ग, अलका सरावगी ने रचना पाठ किया।
ज्ञानपीठ सम्मान से सम्मानित उड़िया की वरिष्ठ रचनाकार प्रतिभा राय की चर्चित कहानी ‘ट्रॉली वाली’ का हिंदी अनुवाद पाठ वरिष्ठ रचनाकार राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा किया गया। उल्लेखनीय है कि उड़िया से हिंदी अनुवाद भी राजेन्द्र प्रसाद मिश्र द्वारा ही किया गया है।
वनमाली कथाशीर्ष सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ कथाकार मृदुला गर्ग ने अपने नये उपन्यास ‘वे नायाब पर्दे’ से जर्मनी पर केंद्रित अंश का बहुत ही भावपूर्ण पाठ किया।

राष्ट्रीय वनमाली कथा सम्मान से सम्मानित वरिष्ठ साहित्यकार अलका सरावगी ने अपने नवीन उपन्यास ‘कलकत्ता कॉस्मोपोलिटन दिल और दरारें’ से एक अंश का बहुत ही संवेदात्मक पाठ किया।
संतोष चौबे ने कहा कि अच्छा पाठ वहीं होता है जो आपको स्तब्ध कर दे। आज मृदुला जी और अलका जी ने बहुत उम्दा पाठ किया। नये समय में जिन बातों का जिक्र होता है वह अकेलापन! अकेलेपन हमारे समय की सबसे बड़ी समस्या बनती जा रही है। अलका जी की कहानी में ड्रामेटिक एलिमेंट है। दृश्य उभर कर आते हैं। कहानी कलकत्ते की याद दिलाती है। बांग्ला, उर्दू, अंग्रेजी का प्रयोग बहुत अच्छा बन पड़ा है।
मृदुला जी ने पाठ किया वह दिल में उतरती चली जाती है। हद से गुजरे हुए लोगों की हद नहीं होती।
सजग और सतर्क अनुवादक है राजेन्द्र जी। बड़े होने के बाद बच्चे माँ के ही रह जाते है।
हिंदी कहानियों की संवेदना और भारतीय भाषाओं में रची जा रही कहानियों में संवेदना और भावुकता का स्तर बहुत ज्यादा है। वह एक अलग तरह की संवेदना लाती है जिसकी हिंदी कहानी को बहुत ज्यादा जरूरत है।
प्रतिभा राय जी ने कहा की मैं ह्यूमनिस्ट हूँ।उपन्यास हैं सिंधु और कहानी है बिंदु। साहित्य की सबसे बड़ी सुंदरता यह है कि वह संवेदना जगाता है। आजकल पुरुष लेखक को लेखक और महिला लेखक को महिला लेखिका के नाम से संबोधित किया जाता है। जबकि लेखक न तो नर होता है न ही नारी वह तो अर्धनारीश्वर होता है। लेखक को निर्भय और संवेदनाओं से ओतप्रोत होना चाहिए। साहित्य और भाषा को जिन्दा रखने के लिए वनमाली सृजन पीठ के प्रयास अनुकरणीय है।
सत्र का संचालन डॉ. संगीता पाठक द्वारा किया गया। आभार डॉ. रुचि मिश्रा तिवारी ने किया। ज्योति रघुवंशी द्वारा अतिथियों और रचनाकारों को प्रतीक चिन्ह और पुस्तकें प्रदान कर सम्मानित किया गया।

डिजिटल युग में साहित्य की बदलती प्रासंगिकताओं पर अंजुम शर्मा का विद्यार्थियों से संवाद
वनमाली कथा सम्मान समारोह के दूसरे दिन आयोजित दूसरे सत्र में “डिजिटल युग में साहित्य – पाठक परिवर्तन और नई प्रासंगिकताएं” विषय पर लेखक अंजुम शर्मा का विश्वविद्यालय के छात्रों के साथ संवाद सत्र आयोजित किया गया। इस सत्र में वरिष्ठ साहित्यकार संतोष चौबे और लीलाधर मंडलोई का विशेष सान्निध्य रहा, जबकि संचालन विकास अवस्थी ने किया। सत्र में बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने सहभागिता कर डिजिटल दौर में साहित्य, पाठक और अभिव्यक्ति के बदलते आयामों पर सार्थक चर्चा की। संवाद के दौरान साक्षात्कार प्रक्रिया से जुड़े प्रश्नों पर अंजुम शर्मा ने अपने अनुभव साझा किए। कठिन और संवेदनशील प्रश्न पूछने के संदर्भ में उन्होंने कहा कि जब साक्षात्कारकर्ता के मन में सामने वाले से कुछ पाने या सहकारिता का भाव नहीं होता, तभी वह निष्पक्ष और प्रभावी प्रश्न पूछ पाता है। उन्होंने जोर देते हुए कहा कि साहित्यिक क्षेत्र में साहित्यकार की गरिमा बनाए रखते हुए, यदि उनकी रचनाओं में विचारों का द्वंद्व दिखाई दे, तो उस पर प्रश्न करना आवश्यक है। ऐसे प्रश्न समय रहते पूछे जाएँ, ताकि संवाद की सार्थकता बनी रहे। अंजुम शर्मा ने बताया कि कई बार साक्षात्कार देने वाले व्यक्ति प्रश्नों का उत्तर बहुत संक्षेप में देकर बातचीत को सीमित कर देते हैं। ऐसे में यदि साक्षात्कारकर्ता लेखक के व्यक्तित्व और जीवन को गहराई से जानता हो, तो वह निजी अनुभवों और प्रसंगों के माध्यम से बातचीत को विस्तार दे सकता है। उन्होंने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि कई साक्षात्कार प्रारंभ में केवल कुछ मिनटों में समाप्त होते प्रतीत हुए, किंतु जब व्यक्तिगत जीवन से जुड़े प्रसंग सामने आए तो संवाद सहज रूप से गहराई में पहुँच गया और वक्ता खुलकर अपनी बात रखने लगा। उन्होंने यह भी कहा कि कई बार हमें लगता है कि साक्षात्कार प्रभावी नहीं रहा, जबकि श्रोताओं और पाठकों के लिए वही सहज और ‘रॉ’ संवाद अधिक प्रामाणिक और आकर्षक होता है। डिजिटल माध्यमों के विस्तार से पाठकों में आए बदलाव के प्रश्न पर अंजुम शर्मा ने स्पष्ट किया कि पाठक मूलतः नहीं बदलता, बल्कि समय के साथ प्रस्तुत किए जाने वाले कंटेंट और माध्यम बदलते हैं। उन्होंने कहा कि साहित्य की संवेदनाएँ स्थायी हैं, केवल अभिव्यक्ति के स्वरूप और प्रस्तुति के तरीके नए होते जाते हैं।
छात्रों ने रंग-संगीत से सजाई वनमाली समारोह की संध्या
वनमाली समारोह के दूसरे दिन आयोजित तीसरे सत्र में रबीन्द्रनाथ टैगोर विश्वविद्यालय के टैगोर राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के विद्यार्थियों द्वारा रंग-संगीत की आकर्षक प्रस्तुति दी गई।
कार्यक्रम की शुरुआत विभिन्न नाटकों से लिए गए गीतों की प्रस्तुति से हुई, जिनमें “बहुत सुंदर लगेगा सूर्य…”, “हाय रे कैसा ये अंधेर…”, “ज्ञान नहीं हो सकता बंदी…”, “पानी नहीं है गांव में…”, “चलो रे नर्मदा धाम…” और “हो नदिया नीर से भरी…” जैसे गीतों ने सामाजिक सरोकार, प्रकृति संवेदना और मानवीय संघर्ष के विविध रंगों को साकार किया। इसके पश्चात साहित्यिक कविताओं में सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ की प्रसिद्ध कविता “वो तोड़ती पत्थर…”, नागार्जुन की “चंद मैंने सपना देखा…”, कुंवर नारायण की “घर रहेंगे…” तथा संतोष चौबे की कविता “थोड़ा हूं थोड़ा बाहर…” को विद्यार्थियों ने सशक्त भावाभिव्यक्ति के साथ प्रस्तुत किया। कार्यक्रम के अंतिम चरण में होली गीतों की सुमधुर प्रस्तुति ने वातावरण को उत्सवी रंगों से भर दिया। “संग नवला…” और “हंस दयलीले चंदन किवाड़े…” जैसे पारंपरिक होली गीतों पर विद्यार्थियों की सामूहिक प्रस्तुति ने लोक संस्कृति की जीवंतता और उत्सवधर्मिता को जीवंत कर दिया।
“मगर शेक्सपियर को याद रखना” ने छोड़ी गहरी संवेदनात्मक छाप
वनमाली कथा सम्मान में रंगशीर्ष नाट्य समूह की प्रभावशाली प्रस्तुति
वनमाली कथा सम्मान समारोह के दूसरे दिन की अंतिम प्रस्तुति के रूप में रंगशीर्ष नाट्य समूह, भोपाल द्वारा लेखक, साहित्यकार एवं कथाकार संतोष चौबे की चर्चित कहानी “मगर शेक्सपियर को याद रखना” का प्रभावशाली नाट्य मंचन किया गया। संजय मेहता द्वारा निर्देशित इस प्रस्तुति ने रंगमंच के संवेदनात्मक और जटिल मानवीय पक्षों को अत्यंत आत्मीयता के साथ दर्शकों के सामने रखा।
नाटक की कथा कार्तिक नामक पात्र के इर्द-गिर्द विकसित होती है, जो रायपुर में एक सम्मेलन के दौरान नाट्य प्रस्तुति आयोजित करने की योजना बनाता है। अनेक विकल्पों के बीच वरिष्ठ नाट्यकर्मी इरफान अहमद साहब को आमंत्रित करने का निर्णय लिया जाता है, जिनके व्यक्तित्व को लेकर उनकी प्रतिभा के साथ-साथ उनके कठोर और अव्यवहारिक स्वभाव की चर्चाएँ भी सामने आती हैं। यात्रा के दौरान कार्तिक और इरफान साहब के बीच विकसित आत्मीय संवाद उनके प्रति कार्तिक के मन में गहरी सम्मान भावना उत्पन्न करता है, किंतु रायपुर पहुँचने पर प्रस्तुति के दौरान इरफान साहब का कठोर व्यवहार और व्यवस्थाओं को लेकर उनकी खिन्नता कार्तिक को आहत कर देती है। फिर इरफान साहब के समूह द्वारा शेक्सपियर के “ए मिडसमर नाइट्स ड्रीम” का अद्भुत मंचन किया जाता है जिसकी दर्शक भी सरहाना करते हैं। सफल आयोजन के बावजूद उत्पन्न मानवीय द्वंद्व तब सुलझता है जब इरफान साहब अपने व्यवहार के लिए क्षमा व्यक्त करते हैं। इस आत्मीय क्षण के माध्यम से नाटक यह संदेश देता है कि व्यक्तिगत कटुताओं से परे कला और उसकी सृजनात्मकता को याद रखा जाना चाहिए — और यही शेक्सपियर को याद रखने का सार है।
निर्देशक संजय मेहता के अनुसार यह कहानी रंगमंच और रंगकर्मियों के जीवन की जटिलताओं, संघर्षों और समाज की जिम्मेदारियों को संवेदनशील ढंग से उजागर करती है। कलाकार के निजी संघर्षों के बीच उसकी सृजनशीलता को बचाए रखने की जद्दोजहद इस प्रस्तुति का केंद्रीय भाव बनकर उभरती है।
मंच पर
सूत्रधार एवं कार्तिक – रूपेश तिवारी
इरफान अहमद साहब – संजय मेहता
अरूणा – शमा खान
अरुण – चित्रांश कुमार
नरेन्द्र – मोहम्मद फैजान
नीरज/ अमित – ग्रीक चांडलिया
जावेद – प्रेम सुरवाडे/विश्वेश / कवर्ष
सुमन – अंकिता पाल,
लतिका जी – गायत्री निगम
अनूप – प्रेम प्रकाश अष्ठाना
मंच से परे
मंच व्यवस्थापक – अंकिता पाल
मंच परिकल्पना – संजय मेहता
मंच सामग्री – चित्रांश, विश्वेश, कुलदीप, आयुष, कार्तिक
वेशभूषा – मो. फैजान, अंकिता पाल, गायत्री निगम, बृजेश शर्मा
प्रकाश परिकल्पना एवं संचालन – कमलेश वर्मा
प्रचार प्रसार – राहुल, सौरभ, कार्तिक, ग्रीक, प्रेम
हारमोनियम – प्रिंस मलक
सारंगी – शिराज हुसैन
कहानी – संतोष चौबे
निर्देशन एवं संगीत – संजय मेहता
समन्वयन – विक्रांत भट्ट



