राष्ट्रपति ट्रंप के असत्य बोल और हमारा विपक्ष

■ नीरज मनजीत
क्या राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप भारत के विपक्षी नेता के रूप में अपनी नई पहचान बना रहे हैं? अक़्सर लगता है कि वे हमारी संसद में ‘लीडर ऑफ अपोजीशन’ का रोल अदा करने के लिए आतुर हुए जा रहे हैं। भारत के संदर्भ में अथवा यह कहें कि प्रधानमंत्री मोदी के संदर्भ में पिछले एक वर्ष के उनके बयानों का विश्लेषण किया जाए, तो यही नतीजा निकलता है।
बड़ा ही प्रसिद्ध मुहावरा है कि क्रिकेट “शानदार अनिश्चितताओं का खेल” है। वैश्विक समुदाय के संदर्भ में यह मुहावरा कुछ यूँ बन रहा है कि “राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप एक बेहद अप्रत्याशित राजनेता के तौर पर विश्व पटल पर उभरकर सामने आए हैं।” राष्ट्रपति बनने के बाद बहुत ही अल्प समय में वे अपनी ‘बहुचर्चित बचकानी अनप्रेडिक्टिबिलिटी’ और असत्य कथनों की वजह से अपने कई दोस्तों को असमंजस और दिक़्क़त में डाल चुके हैं। प्रधानमंत्री मोदी भी उनमें से एक हैं।
एक तरफ़ तो वे मोदी की तारीफ़ में कसीदे पढ़ते हैं, तो ठीक उसी दिन शाम तक ऐसा एक असत्य कथन उछाल देते हैं, जिसे हमारे यहाँ के विपक्षी नेता लपककर तोते की तरह दोहराने लगते हैं। ट्रंप प्रशासन के अधिकारी भी इस मामले में कम नहीं हैं। वे भी अपने अवांछित बयानों से मोदी सरकार के लिए परेशानी खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ते। ऐसा लगता है कि ये सब कुछ योजनाबद्ध तरीक़े से जानते-बूझते किया जा रहा है। दुनियाभर को दबाव में रखना अमेरिका का सबसे बड़ा शगल है। मोदी को दबाव में रखने के लिए ट्रंप और उनके अधिकारी गाहे-बगाहे हमारे विपक्ष को कोई-न-कोई मुद्दा थमाते रहते हैं।
ऑपरेशन सिंदूर के बाद ट्रंप तक़रीबन डेढ़ सौ बार असत्य बोल चुके हैं कि उन्होंने दबाव डालकर भारत-पाकिस्तान के बीच सीज़फायर करवाया था। इस झूठे बयान पर नमक-मिर्च लगाकर राहुल गांधी और मल्लिकार्जुन खड़गे तक़रीबन दो सौ बार मोदी को कठघरे में खड़ा कर चुके हैं कि उन्होंने ट्रंप के आगे सरेंडर कर दिया है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने दो बार संसद में दो टूक शब्दों में कहा था कि पहलगाम हमले के बाद 22 अप्रैल से 19 जून तक प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप के बीच कोई फ़ोन वार्ता नहीं हुई है। प्रधानमंत्री मोदी ने भी विपक्ष के सारे धागे उधेड़ते हुए स्पष्ट रूप से कहा था कि युद्ध रोकने का फ़ैसला विशुद्ध रूप से ख़ुद भारत का था और इसमें दुनिया के किसी भी देश का रत्ती भर भी हस्तक्षेप नहीं था। मगर इससे न तो ट्रंप को कोई फ़र्क़ पड़ा, न राहुल गांधी और बाक़ी विपक्ष को। वे बदस्तूर ट्रंप के असत्य को सच बताने की कोशिश करते रहे।
ठीक इसके बाद ट्रंप एक और असत्य लेकर आ गए। उन्होंने कहा कि ऑपरेशन सिंदूर में भारत के पाँच रॉफेल लड़ाकू विमान गिराए गए थे। इस बयान को भी विपक्षी नेता ले उड़े और मोदी सरकार से पूछने लगे कि बताएँ कितने रॉफेल गिरे। इस मामले में बड़ी अजीब बात यह थी कि पाक और चीनी मीडिया चीन के लड़ाकू विमानों को रॉफेल से श्रेष्ठ साबित करने में लगा हुआ था। जबकि हमारा विपक्ष भारतीय सेना के बयानों को सच न मानकर पाकी-चीनी मीडिया के झूठे प्रोपेगैंडा को लेकर मोदी सरकार को कठघरे में खड़ा कर रहा था। ट्रंप का असत्य तो जगज़ाहिर था। वे कभी पांच, तो कभी सात या नौ विमान गिराए जाने की बात कह रहे। एक बार तो उन्होंने कह दिया कि ग्यारह विमान गिरे थे।
भारत की अर्थव्यवस्था को मृत बताना ट्रंप का सबसे बड़ा असत्य था। इस असत्य को भी राहुल गांधी ने ज्यों-का-त्यों दोहरा दिया था, जबकि उस वक़्त 6.4 फ़ीसदी की दर से आगे जा रही भारत की अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज बढ़ती इकोनॉमी थी। इंटरनेशनल मॉनेटरी फण्ड सहित ख़ुद अमेरिका की तीन रेटिंग एजेंसियों– मोर्गन एंड स्टेनली, गोल्डमैन और एसएंडपी ग्लोबल–ने ट्रंप के असत्य का पर्दाफ़ाश कर दिया था। इन सब वैश्विक एजेंसियों के मुताबिक भारत फ़िलहाल दुनिया की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है और अगले पाँच वर्षों में यह तीसरी सबसे बड़ी इकोनॉमी होने की राह पर है।
इसी बीच भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड डील हुई, तो एक बार फिर ट्रंप प्रशासन के अधिकारियों ने अवांछित बयान दिए और हमारे विपक्ष को ग़लत और झूठी कहानियाँ फ़ैलाकर हमारे सीधे-सादे भोले-भाले किसानों के मन में संशय पैदा करने का मौका दे दिया। अमेरिका की कृषि सचिव ब्रूक रोलिंस ने एक्स पर लिख दिया कि इस ट्रेड डील से भारत के विशाल बाजार में अमेरिकी कृषि उत्पादों का निर्यात बढ़ेगा। अमेरिकी व्यापार अधिकारी जैमीसन ग्रीर ने कह दिया कि भारत अमेरिका ट्रेड डील से अमेरिकी किसानों को फायदा होगा। ये दोनों बयान गैरज़रूरी और शरारतपूर्ण थे। जब तक ट्रेड डील का कोई आधिकारिक मसौदा सामने नहीं आ जाता, तब तक इन बयानों का कोई मतलब नहीं था। इन बयानों को आधार बनाकर हमारा विपक्ष, ख़ासकर कांग्रेस, और किसानों के कुछ स्वयंभू नेता, बयानों की ग़लत व्याख्या करके किसानों को सड़क पर उतारना चाहते हैं। मक़सद साफ़ है–मोदी सरकार के लिए दिक़्क़तें खड़ी करना।
मिडिल ईस्ट में युद्ध भड़कने के बाद एक बार फिर ट्रंप प्रशासन की ओर से अवांछित कथन आता है। अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट कहते हैं कि हम भारत को रूसी तेल खरीदने के लिए 30 दिन की “अनुमति” देते है। इस बयान के पीछे भी शरारत स्पष्ट झलक रही है। विपक्ष मोदी सरकार पर हमलावर है कि मोदी ने ट्रंप के आगे सरेंडर कर दिया है। विपक्षी नेता मोदी की ख़ामोशी पर तरह-तरह की व्यंग्योक्तियों के तीर चलाकर ‘नरेन्दर सरेंडर’ के नारे उछाल रहे हैं। कांग्रेस ने तो संसद के बाहर एक पोस्टर ही लगा दिया, जिसमें मोदी को ट्रंप के आगे घुटने टेके हुए दिखाया गया था।
सारी दुनिया को पता है कि भारत पिछले चार वर्षों से रूस से तेल ख़रीद रहा है। इसके लिए भारत सरकार को किसी से इजाज़त लेने की जरूरत न पहले कभी थी, न आगे कभी होगी। ज़ाहिर है कि विपक्षी नेता, ख़ासकर राहुल गांधी, चाहते हैं कि मोदी ट्रंप के ख़िलाफ़ कोई ग़लतबयानी करके उलझ जाएँ और वे तमाशा देखें। मगर मोदी पहले भी कांग्रेस की चाल में नहीं फँसे, न आगे फँसने वाले हैं।
आज की वैश्विक बिरादरी के पेंचोख़म को वे भली-भांति समझते हैं। उनकी गरिमापूर्ण चुप्पी ही उनका जवाब है। वे भारत के हितों को सर्वोच्च प्राथमिकता देते हुए चुपचाप अपना काम कर रहे हैं। यह उनकी ‘वैश्विक समुदाय के विपरीत ध्रुवों को साधकर रास्ता निकालने की अद्भुत कूटनीति’ की ही जीत है कि ईरान ने भारतीय जहाज़ों को होर्मुज़ ट्रेट (जलडमरूमध्य) से निकलने की अनुमति दे दी है। इस जलडमरूमध्य पर ईरान का अघोषित कब्ज़ा है। भारत में तेल और गैस से भरे जहाज़ों को लाने का यह निकटतम समुद्री मार्ग है। इसके लिए मोदी ने ईरान के राष्ट्रपति मसूद पेजेश्कियान से हॉटलाइन पर लंबी बातचीत की थी। विदेश मंत्री एस जयशंकर भी ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची से बराबर संपर्क में थे।
जहाँ तक राष्ट्रपति ट्रंप की बात है, तो सारी दुनिया, जिनमें भारत के लोग भी शामिल हैं, उनके बयानों की हक़ीक़त अच्छी तरह जानती-समझती है, इसलिए ट्रंप के कथनों को दोहराकर विपक्ष अपना ही नुक़सान कर रहा है।