जबलपुर के बरगी बांध में मछली उत्पादन से होगी लाखों की कमाई, सरकार दे रही केज फार्मिंग पर सब्सिडी

IndiaEdgeNews:

जबलपुर 

मध्य प्रदेश के जबलपुर सहित उसके आसपास के इलाकों में मछली पालन सदियों से मछुआरा समुदाय की आजीविका का प्रमुख साधन रहा है. शहर और ग्रामीण क्षेत्रों में सैकड़ों तालाब हैं, जहां परंपरागत तरीके से मछली पालन किया जाता है. हालांकि, इस पद्धति में उत्पादन सीमित रहता है. इसलिए अब मछली उत्पादन बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल किया जा रहा है. इसमें केज फार्मिंग यानी जाल के पिंजरों में मछली पालन की तकनीक महत्वपूर्ण साबित हो रही है. इस तकनीक से कम जगह में अधिक मात्रा में मछली का उत्पादन किया जा सकता है। 

7 महीने में 3 टन तक मछली उत्पादन
जबलपुर मत्स्य विभाग के संयुक्त संचालक राजा राजतिलक धुर्वे के मुताबिक, ''केज फार्मिंग में एक पिंजरा 5 मीटर लंबा, 5 मीटर चौड़ा और 4 मीटर गहरा होता है. इसमें करीब 7 महीने में 3 टन तक मछली का उत्पादन लिया जा सकता है. एक केज स्थापित करने में लगभग 3 लाख रुपये की लागत आती है. इसमें मछलियों के दाने पर करीब डेढ़ लाख रुपये खर्च होते हैं. उत्पादन के बाद पहले ही साल में निवेश की लागत निकलने के साथ 50 हजार से 1 लाख रुपये तक की बचत हो सकती है. दूसरे साल यह बचत बढ़कर करीब 2 लाख रुपये तक पहुंच सकती है। 

बरगी बांध में सफल रहा प्रयोग
जबलपुर के बरगी बांध के बैकवॉटर में पिछले तीन साल से केज फार्मिंग के जरिए मछली उत्पादन किया जा रहा है. फिलहाल एक निजी उद्यमी इस तकनीक से मछली पालन कर रहा है और इसके परिणाम उत्साहजनक रहे हैं. यहां पंगासियस और तिलापिया प्रजाति की मछलियों का उत्पादन किया जा रहा है. इन प्रजातियों को केज फार्मिंग के लिए उपयुक्त माना जाता है। 

16 हजार हेक्टेयर जल क्षेत्र
मत्स्य विभाग के मुताबिक, बरगी बांध में लगभग 16 हजार हेक्टेयर जल क्षेत्र उपलब्ध है. इसमें करीब 160 हेक्टेयर क्षेत्र का उपयोग केज फार्मिंग के लिए किया जा सकता है. विभाग का मानना है कि इस तकनीक का विस्तार होने से मछली उत्पादन में बड़े पैमाने पर वृद्धि की संभावना है। 

दो मॉडल में सरकार दे रही प्रोत्साहन
मछली उत्पादन की नई नीति के तहत सरकार दो मॉडल पर काम कर रही है. पहला उद्यमी मॉडल है, जिसमें एक उद्यमी को 250 केज स्थापित करने होते हैं. इस परियोजना में करोड़ों रुपये का निवेश होता है. मछली के दाने की व्यवस्था से लेकर प्रसंस्करण और निर्यात तक की सुविधाएं विकसित करने के लिए सरकार सब्सिडी भी उपलब्ध कराती है। 

एक बार में 72 केज लगाने की अनुमति
दूसरा मॉडल हितग्राही आधारित है. इसके तहत मछुआरा समितियों को 72 केज लगाने की अनुमति दी जा सकती है. वहीं, व्यक्तिगत उद्यमी एक बार में 18 केज स्थापित कर सकता है. इसके लिए शासन बड़े बांधों के बैकवॉटर में उपयुक्त जल क्षेत्र लीज पर उपलब्ध कराने की व्यवस्था कर रहा है। 

कलेक्टर ने भी दिखाई रुचि
जबलपुर के नवागत कलेक्टर अरुण कुमार विश्वकर्मा ने भी बरगी बांध में केज फार्मिंग तकनीक से हो रहे मछली उत्पादन का अवलोकन किया. उन्होंने इस तकनीक को उपयोगी मानते हुए इसके विस्तार की संभावनाओं पर अधिकारियों से चर्चा की है। 

मछली पालन में अधिक श्रम का मिला तोड़
सामान्य मछली पालन में उत्पादन में काम होता है. इसके साथ ही मछुआरों को मछली पालन में बहुत अधिक श्रम करना पड़ता है, क्योंकि मछली को पकड़ना बहुत कठिन होता है, लेकिन केज मैं मछली पूरी तरह नियंत्रित रहती है और उसे आसानी से पकड़ा जा सकता है. इसलिए इसमें श्रम भी कम लगता है. मछली उत्पादन का यह तरीका नया नहीं है, लेकिन मध्य प्रदेश में इसके बहुत कम प्रयोग हुए हैं. जबलपुर के बरगी बांध का प्रयोग पूरी तरह सफल है। 

मत्स्य उत्पादन की नई नीति के तहत मध्य प्रदेश के बड़े बांधों और जलाशयों में केज फार्मिंग को बढ़ावा देने की तैयारी है. इसमें प्रदेश के साथ दूसरे राज्यों के बड़े मछली उत्पादक भी रुचि दिखा रहे हैं. अगर इस तकनीक का योजनाबद्ध तरीके से विस्तार किया जाता है तो यह न केवल मछुआरा समुदाय के लिए रोजगार और आय का नया माध्यम बन सकती है, बल्कि मध्य प्रदेश को मछली उत्पादन और निर्यात के क्षेत्र में भी नई पहचान दिला सकती है। 

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