क्या हैं बच्चों के अंदर बढ़ रहे अपराध के कारण?

शम्भू शरण सत्यार्थी
नई दिल्ली के करावल नगर में एक नवम वर्ग की एक छात्रा का शव विद्यालय के बाथरूम से मिला। हत्या के आरोप में तीन छात्रा को गिरफ्तार किया गया।
यमुनानगर के एक विद्यालय के 12 वीं कक्षा के एक छात्रा ने अपनी खराब उपस्थिति पर डांटे जाने से नाराज होकर अपनी प्रिंसिपल की गोली मारकर हत्या कर दी।
नोएडा में एक नाबालिग ने अपनी बहन और माँ की हत्या कर दी। उसकी माँ और बहन पढ़ाई के लिए उसे डांटते थे। इससे वह क्षुब्ध था।
दिल्ली में पाँच स्कूली नाबालिग छात्रों ने एक 17 वर्षीय बी काम के छात्रा को चाकू मारकर हत्या कर दी। वहीं गुड़गांव के रेयान इंटर नेशनल स्कूल में सात साल के प्रदुम्न की 11 वीं क्लास के एक छात्रा ने हत्या कर दी।
ये चंद उदाहरण हैं नाबालिग बच्चों के अंदर बढ़ती हुई हिंसक प्रवृत्ति के। देश का भविष्य कहे जाने वाले किशोर हिंसक क्यों होते जा रहे हैं। अपने से बड़ों और शिक्षकों के प्रति सम्मान की भावना उनके अंदर समाप्त होती जा रही है। उक्त घटनायें समाज के हर वर्ग को चिंतन और मंथन करने के लिए बाध्य कर रही हैं। अगर किशोरों के अंदर यह प्रवृत्ति विकसित होती रही और इसे रोकने का कोई कारगर उपाय नहीं हुआ तो आनेवाला कल का समय सचमुच अंधकारमय होगा।
विगत कुछ वर्षों से हमारे समाज में परिवारों की तस्वीर तेजी से बदली है। संयुक्त परिवारों का तानाबाना टूट चुका है। एकल परिवारों में बच्चों से बात करने व उनके साथ समय बिताने के लिए माता पिता के पास समय नहीं है। शिक्षकों को शिक्षा और छात्रा से कोई खास वास्ता नहीं है। अधिकांश शिक्षकों का नजरिया व्यवसायिक हो गया है।छात्रो में भी शिक्षकों के लिए आदर और सम्मान नहीं रहा। विगत कुछ वर्षोंं में शिक्षा का पूरी तरह से व्यवसायीकरण हो गया है।
बच्चों के अंदर बढ़ रहे अपराध के कई कारण हैं।
पारिवारिक कारण-
परिवार बच्चों की प्रथम पाठशाला मानी जाती है। एकल परिवार होने की वजह से अधिकांशतः घरों में दादा दादी, चाचा चाची नहीं हंै। बच्चे अकेलेपन, सन्नाटे, घुटन और उपेक्षा के बीच बड़े हो रहे हैं। परिवार के अंदर कलह, लड़ाई, झगड़ा होते रहना। अभिभावकों द्वारा बच्चों को समान रूप से प्यार नहीं मिलने पर वे अपने को अलग कर लेते हैं और उनके अंदर अपराध की भावना जागृत होने लगती है।
बड़ों का अनुकरण-
बच्चे घर में अपने से बड़े भाई बहन एवं माता पिता का अनुकरण करते हैं। अगर घर में बड़े सदस्य अपराधी प्रवृत्ति के हैं और बच्चों के साथ बुरा व्यवहार करते हैं तो उनके अंदर विद्रोह की भावना पनपने लगती है।वे भी उसी रास्ते पर चलने लगते है।
शारीरिक और मानसिक कारण-
शारीरिक और मानसिक रूप से दुर्बल बच्चे भी अपने अंदर हीनता की भावना की वजह से अपराध की ओर कदम बढ़ाने लगते है।
सामुदायिक कारण-
बच्चे जब अपने परिवार से निकलते हैं तो आस पड़ोस के लोगों से मिलते हैं। अगल बगल के बच्चों के साथ खेलते हंै। खेलने वाले बच्चे अगर अपराधी प्रवृत्ति के होते हैं तो उसका असर उनपर भी पड़ता है। आस पास में वेश्याआंे के अड्डे ,जुआरियों, शराबियों के पास निवास स्थान होने से बच्चों के अपराधी होने के अवसर अधिक होते हैं।
विद्यालय का प्रभाव-
बच्चों के अंदर विद्यालय के वातावरण का अत्यधिक प्रभाव पड़ता है। विद्यालय के शिक्षकों, छात्रों का गलत रवैय्या। पाठ्यक्रम का बोझिल होना, मनोरंजन का अभाव, अयोग्य छात्रों को अधिक अंक लाना आदि कुछ ऐसे कारण हैं जो बालकों को अपराधी बनाते हैं। कम अंक प्राप्त करने एवं फेल होने पर अभिभावकों एवं शिक्षकों द्वारा उत्पीड़न किया जाना एवं अन्य छात्रों द्वारा मजाक उड़ाने की वजह से उनके अंदर हीनता की भावना पनपने लगती है और अपराध की ओर अग्रसर होने लगते हैं।
सिनेमा एवं इंटरनेट-
सिनेमा एवं सीरियल देखकर अपराध करने के तरीके बच्चे आसानी से सीख लेते हैं। हमारे देश में चोरी, सेंधमारी, पाकेट मारी, एवं अपहरण के आरोप में जब बाल अपराधी पकड़े जाते हैं। उनसे जब पूछताछ होती है तो वे बताते हंै कि सिनेमा एवं सीरियल से मुझे इन तरीकों की जानकारी मिली थी।
इंटरनेट एवं सोशल साइटों के जरिये मन बहलाने एवं मनोरंजन की प्रक्रिया में बच्चे भटकाव की स्थिति में चले जाते हैं।
बच्चों को अपराधी बनाने में एक कारक का हाथ नहीं होता। कई कारणों से बच्चे अपराध की दुनियां में पैर रखने लगते हैं।
हमें इस बात पर विचार करना चाहिए कि हमारे बच्चे इतने संवेदनहीन और हिंसक क्यों होते जा रहे हैं ? मामूली बात पर जान देने और लेने पर क्यों उतारू होते जा रहे हैं ?
बच्चों की समस्याओं का समाधान उनके साथ समय देकर दुलार और प्यार से बात करने से ही हो सकता है। बच्चों को अच्छी परवरिश, संस्कारयुक्त शिक्षा और अच्छा वातावरण प्रदान कर हम बच्चों को हिंसक होने से रोक सकते हैं।