वन्य जीव अधिनियम में संशोधन से क्या बदलाव होगा?

डा. अरविंद मिश्रा
वन्य जीवों में रुचि रखने वालों के लिये नई खबर है कि एक अप्रैल 2023 से वन्य जीव अधिनियम अपने संशोधित (2022) रुप में भारत में लागू हो गया है। यह भी जानकारी मिल रही है कि इस नये संशोधित अधिनियम में सारस की संकटापन्न प्रजातियों को अनुसूची 2 और 4 से अपग्रेड कर अनुसूची 1 में ला दिया गया। यह देखा जाना है कि सम्प्रति कानपुर चिड़ियाघर में क्वैरेंन्टीन विवादित सारस प्रजाति ग्रुस एन्टिगान को भी क्या अनूसूची 1 में लाया गया है अथवा नहीं।
ताजातरीन एक्ट में चिड़ियाघरों को लेकर कोई नयी व्यवस्था की गयी है अथवा नहीं, यह भी देखा जाना महत्वपूर्ण होगा। अब समूची दुनिया में जनमत इस पक्ष में है कि चूंकि चिड़ियाघरों में वन्य जीवों को आजीवन बंधन में रहना पड़ता है इसलिये धीरे-धीरे चिड़ियाघरों की व्यवस्था खत्म करके नेशनल पार्कों और अभयारण्यों (सैंक्चुयरी) को बढ़ावा मिलना चाहिए। खासतौर पर उनके हैबिटैट के संरक्षण के उपायों पर विशेष ध्यान और धन देना चाहिए। चिड़ियाघरों के प्रबंध पर हो रहे भारी व्यय को उधर डाइवर्ट किया जा सकता है।
चिड़ियाघरों में दर्शकों और वहां के कर्मियों के साथ दुर्घटनाओं की एक लम्बी सूची है। यह अविश्वसनीय सा है किन्तु सच है कि अकेले बाघ के हमले में विगत दशकों में तीन लाख से ऊपर लोगों की मृत्यु हुई है जिसमें चिड़ियाघरों में हुई दर्दनाक मौतें भी शामिल हैं। 31 जुलाई 2012 को मंगलौर के चिड़ियाघर में एक चिड़ियाघर कर्मी को ही बाघ ने निवाला बना लिया था। 2014 में दिल्ली के चिड़ियाघर में ऐसी ही एक दुर्घटना में सफेद बाघ ने दुर्घटनावश अपने बाड़े में गिरे युवक का काम तमाम कर डाला।
इन घटनाओं में वन्य पशुओं का दोष नहीं है बल्कि कैद में रहने के कारण वे मानसिक अवसाद और असंतुलित अवस्था में रहते हैं। आपने कई चिड़ियाघरों में हिंसक पशुओं को बायें से दायें लगातार चलते हुये देखा होगा। यह तनावग्रस्त व्यवहार है। इसमें उनका व्यवहार अप्रत्याशित होता है।
वैसे भी चिड़ियाघरों का महत्व शुरु में इसलिये था कि उनसे मनोरंजन और शिक्षा खासकर बच्चों को मिलती थी। तब सर्कस भी इसी कार्य के लिए लोकप्रिय थे किन्तु सर्कसों में वन्यपशुओं की बेकद्री, कुपोषण और क्रूरता को देखकर उन्हें बैन किया गया। वन्य जीव अधिनियम 1972 के प्रावधानों के अनुसार भी उन्हें बंधक नहीं रखा जा सकता था। अब विजुअल मीडिया वन्य जीवन की विविधता पर प्रशंसनीय सामग्री दिखा रहा है। डिस्कवरी, एनिमल प्लेनेट जैसे कार्यक्रम बहुत लोकप्रिय हैं। अब तो यूट्यूब फेसबुक और अन्य सोशल मीडिया पर अनेक मनोरंजक और शिक्षाप्रद वन्य जीव कार्यक्रम सहज ही दृष्टव्य हैं।
वर्चुअल रियलिटी के मेटावर्स में अब वह दिन दूर नहीं जब दर्शक वन्य जीवों को मात्रा देख ही नहीं, उनका स्पर्श भी महसूस कर सकेंगे जो सुविधा चिड़ियाघरों में नहीं है। आप वहाँ किसी भी जीव जंतु को दूर से ही देख सकते हैं। इस तरह चिड़ियाघरों का औचित्य अब नहीं रहा उनको एक तयशुदा कालक्रम और तरीके से बंद कर जन्तुओं को अभयारण्यों में शिफ्ट ( ट्रांसलोकेट) किया जा सकता है।
फेसबुक पर संपन्न एक ताजातरीन रायशुमारी में तकरीबन नब्बे फीसदी लोगों ने चिड़ियाघरों को बंद करने के पक्ष में आवाज बुलंद की है जिससे वन्यजीवों को उम्रकैद से निजात मिले और वे और उनकी पीढ़ियां मुक्त जन्में और ताउम्र उन्मुक्त वन विहार कर सकें। इस दिशा में नीति नियोजकों को गंभीरता से सोचना होगा।