क्या मिडिल ईस्ट में स्थायी शांति की राह खुलेगी ?

● नीरज मनजीत

एक बड़ी तबाही और लंबी शांति वार्ता के बाद आखिर रविवार को इज़राइल और हमास के बीच युद्धविराम लागू हो गया है। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन, क़तर के प्रधानमंत्री शेख मोहम्मद बिन अब्दुल रहमान अल थानी और मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतेह अल-सिसी पिछले एक वर्ष से इस सीज़फायर के लिए प्रयत्न कर रहे थे। चुनाव जीतने के बाद डोनाल्ड ट्रंप भी इसके लिए दबाव बना रहे थे। युद्धविराम की शर्तों के मुताबित हमास क्रमबद्ध तरीक़े से इज़राइली बंधकों को छोड़ेगा और बदले में इज़राइल के जेलों में बंद फिलिस्तीनी कैदियों को छोड़ा जाएगा। इन क़ैदियों में बहुत से बंदी हमास और हिजबुल्लाह के खूंखार आतंकवादी भी हैं।

यद्यपि इज़राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और उनके मंत्रिमंडल ने बहुमत से इस फ़ैसले पर मुहर लगाई है, मगर इज़राइली सरकार के तीन धुर दक्षिणपंथी मंत्रियों ने सीज़फायर के फ़ैसले की जमकर मुख़ालफ़त की है। उन्होंने इस सीज़फायर को आतंकवाद की जीत बताया है। इधर हमास ने भी अपनी अकड़ दिखाते हुए कहा है कि इस युद्ध से इज़राइल को कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और आख़िर वे ही युद्ध अपराधी साबित हुए हैं। हमास के ऐसे अवांछित अहंकार को देखते हुए नेतन्याहू ने इसे ‘अस्थायी युद्धविराम’ करार देते हुए कहा है कि यदि हमास और हिजबुल्लाह अपना रवैया नहीं बदलेंगे, तो हमने ‘युद्ध का विकल्प’ खुला छोड़ रखा है।

इधर डोनाल्ड ट्रंप मानते हैं कि भावी शांति प्रयासों से इसे स्थायी रूप दिया जा सकता है। 2020 में डोनाल्ड ट्रंप की मध्यस्थता से ही अब्राहम समझौते के तहत संयुक्त अरब अमीरात, मोरक्को और बहरीन ने इज़राइल के साथ कूटनयिक रिश्ते जोड़े थे। सऊदी अरब के सुल्तान मोहम्मद बिन सलमान भी इज़राइल से स्थायी समझौते की तरफ बढ़ रहे थे। इन शांति वार्ताओं से द्विराष्ट्र के सिद्धांत और एक आज़ाद फिलिस्तीनी राष्ट्र के निर्माण पर तक़रीबन सहमति बनती नज़र आ रही थी। मगर अफ़सोस कि जब सबकुछ सही रास्ते पर था, तब ये कोशिशें अमन के दुश्मनों की बुरी नज़रों का शिकार हो गईं। ईरान, लेबनान और ऐसे ही कुछ मुल्क़, जिन्होंने अमेरिका और इज़राइल के प्रति बेवजह की खुन्नस पाल रखी थी, मिडिल ईस्ट में अमन की बहाली क़तई नहीं चाहते थे।

इस नामुराद जंग में गाज़ा पट्टी में 46 हजार से ज़्यादा फिलिस्तीनी मारे गए हैं। इनमें आधे से ज़्यादा बच्चे और औरतें हैं। तक़रीबन एक लाख नागरिक अपंग हो गए हैं। 19 लाख नागरिक विस्थापन की भयानक तकलीफें झेल रहे हैं। यह एक बहुत बड़ी मानवीय त्रासदी है और इसके लिए इज़राइल जितना जिम्मेदार है, उससे कहीं ज़्यादा हमास और हिजबुल्लाह के आतंकी सरगना याह्या सिनवार और नसरुल्लाह जिम्मेदार हैं। ईरान, लेबनान जैसे देश भी उतने ही जिम्मेदार हैं, जिन्होंने अमन के रास्ते पर जाते इस इलाके को एक बड़े युद्धक्षेत्र में बदल दिया था।

जंग की शुरुआत हमास ने की थी। पिछले साल 7 अक्टूबर को दक्षिणी इज़राइल के नागरिक इलाक़े में हमास के आतंकवादियों ने बर्बर हमले को अंजाम दिया था। यह हमला इस सदी का सबसे क्रूर जीनोसाइड था, जिसमें युद्ध के सारे नियम तोड़ दिए गए थे। निरीह स्त्रियों से निर्मम रेप किया गया, मासूम बच्चों के गले काट दिए गए और आम नागरिकों को गोली मार दी गई। इस बर्बरता का नंगा प्रदर्शन करते हुए पूरी दुनिया में वीडियो वायरल किया गया। 240 लोगों को बंधक बना लिया गया, जिनमें बच्चे और वृद्ध स्त्री-पुरुष भी शामिल थे। मक़सद बिल्कुल साफ़ था–इज़राइल को घुटनों पर लाना और पूरी दुनिया को दहशत की जीत का संदेश देना। बंधकों को उत्तरी गाज़ा की सुरंगों में क़ैद कर लिया गया। हमास के इस पशुवत कृत्य को दूसरे हिजबुल्लाह और हैती के आतंकी संगठन का खुला समर्थन और ईरान का अपरोक्ष साथ हासिल था।

इन सब विध्वंसक संगठनों को क़तई उम्मीद नहीं थी कि इज़राइल का प्रत्युत्तर इतना तगड़ा होगा। इज़राइली सरकार ने हमास के ब्लैकमेल के आगे झुकने से इंकार कर दिया और पूरी ताक़त से गाज़ा के नागरिक इलाकों में कायरों की तरह छिपे हमास के आतंकियों पर हमला बोल दिया। चूंकि हमास के आतंकियों ने अस्पताल, स्कूल, मस्जिद और घने रिहायशी इलाकों में ठिकाने बना रखे थे, इसलिए वे निश्चिंत थे कि नैतिकता के नाते इज़राइली आर्मी इन ठिकानों पर हमला नहीं करेगी। और अगर ऐसा हुआ भी, तो दुनियाभर में इज़राइल को बदनाम करने के लिए फिलिस्तीन समर्थक बौद्धिक वर्ग सक्रिय हो जाएगा और इज़राइल को वैश्विक स्तर पर दबाव का सामना करना पड़ेगा। उनका अंदाज़ा बिल्कुल ग़लत साबित हुआ। इज़राइली डिफेंस फ़ोर्स ने ईरान की धमकियों और हमास के समर्थक मुस्लिम मुल्कों से डरे बग़ैर पूरे गाज़ा में कायर हमास पर हमला बोल दिया। हम इसीलिए कह रहे हैं कि गाज़ा में जो जनहानि हुई है, उसके लिए हमास ही ज़्यादा जिम्मेदार है।

हमास का चीफ याह्या सिनवार इस हमले का मास्टरमाइंड था, जो कायरों की तरह एक नागरिक इलाक़े में बनाई गई भूमिगत सुरंग में छिपा हुआ था और पिछले साल इज़राइली डिफेंस फोर्स के हाथों मारा गया था। याह्या हमास का सबसे खूंख़ार उग्रवादी-आतंकवादी था। युवावस्था में ही वह आतंकी संगठनों से जुड़ गया था और ऐलानिया तौर पर उसने इज़राइल को मिटा देने की क़समें खाई थीं। नतीजतन उसे 22 वर्ष इज़राइली जेलों में बिताने पड़े थे। 2011 में जब उसने गाज़ा पट्टी में अमन की बहाली का वादा किया, तो उसे रिहा कर दिया गया। मगर जेल से निकलते ही एक बार फिर उसने इज़राइल के ख़िलाफ़ आतंकी साज़िशें रचनी शुरू कर दीं। इन्हीं हरकतों की वजह से 2015 में अमेरिका ने उसे मोस्ट वांटेड आतंकवादी घोषित कर दिया था। 2017 में वह पैंतरा बदलकर गाज़ा के लोगों से अमन की अपील करते हुए ख़ुद को अमनपसंद दिखाने की कोशिश करने लगा। यह तो 7 अक्टूबर के हमले के बाद पता चला कि ऐसा उसने इज़राइली सरकार और ख़ुफ़िया एजेंसी मोसाद को झांसे में डालने के लिए किया था।

दरअसल यह पैंतरा उसकी दीर्घकालीन रणनीति का हिस्सा था। अमनपसंदगी के उसके ऐलान के बाद गाज़ा पट्टी में शांति की राह खुलते देख 2018 में उसे हमास चीफ़ बना दिया गया। गाज़ा की जनता ने हमास को सत्ता भी सौंप दी थी। यहीं से याह्या के षड़यंत्रों की शुरुआत हुई। उसने गुपचुप तरीके से पूरे उत्तरी गाज़ा में भूमिगत सुरंगों का जाल बिछा दिया। इस बात का खास ध्यान रखा गया कि इन सुरंगों का कंट्रोल रूम किसी अस्पताल, स्कूल, घने रिहायशी इलाके या मस्जिद के नीचे रहे, जहाँ बड़ी तादाद में हथियार स्टोर किए जा सकें। यह काम कई सालों तक चला और बताया जाता है कि ईरान ने इसमें उसकी बड़ी मदद की थी।

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